एक रात ऐसी भी

 *"""एक रात ऐसी भी """* 33वीं वाहिनी



 क्लास से लौटने के बाद वर्दी लेकर  धुलने चला गया , धुलकर बस आकर लेटा ही था कि शाम की परेड की सीटी बज गई , शुक्र है आज रायफल नहीं उठानी थी लेकिन जाना IT में ही था, इसलिए 15-20 मिनट थे हमारे पास ,  मेरे आसपास के सभी लोग पीतल और सूज साफ कर रहे थे मैं भी तुरंत उनमें शामिल हो गया , अन्ततः बावर्दी दुरुस्त होकर हम समय से ग्राउंड आ गए।

हम सब टोलीवाइज एलाइमेंट पर खड़े हो गए,तभी पीछे छूटे हुए लोगों को कुल्दीप सर ने रोक लिया, देरी का कारण पूछा और मेढक चाल में टोली में मिल जाने को कहा , जोकि लगभग रोज कोई न कोई फंस ही जाता था,  उनमें मेरी टोली के भी 2 लोग थे जो कुछ कदम मेढक चले और भागकर टोली में मिल गए।

तभी माइक की आवाज आई परेड .......सावधान....दाहिने सज....

मेजर साहब ने सभी कमांडरों को अपने पास गणना के लिए बुला लिया , कमांडर के जाते ही टोलियों में थोड़ी - थोड़ी बातें शुरू हो जातीं ,  ऐसे कुछ लोग हर टोली में थे जो इस टाइम भी शांत न रहते कुछ न कुछ दबी आवाज में बोलते ही रहते , खैर ऐसी प्रजाति के लोग हर टोलियों में पाए जाते जो हमेशा मक्खियों की तरह भिनकतें रहते , तभी सामने मंच के पीछे वाली सड़क से एक शख़्स आते दिखाई दिए , सभी टोलियों के सभी सदस्यों ने इशारों में एकदूसरे को उनके आगमन की सूचना दी तथा मध्य और पिछली लाइन में खड़े कुछ लोग अर्द्ध सावधान से पूर्ण सावधान में आ गए , सभी लोगों ने अपने चेस्ट नंबर पर हाथ फेरा और खड़े खड़े खुद को रीचेक किया , ये शख़्स कोई और नहीं बल्कि हमारे सूबेदार मेजर श्री धर्मराज भदौरिया साहब थे।


भदौरिया सर .....ऊंचा कद , रंग गोरा , आंखे हल्की भूरी किंतु चेहरे पर एक विशेष तेज  तथा उनकी बुलंद आवाज उन्हें सबसे अलग बनाती थी , उम्र लगभग पचास साल एक बड़ी जेल के जेलर की तरह उनकी अपनी एक अलग ख्याति थी ,जब वो परेड में कुछ दिशानिर्देश देते  तो उनका रवैया काफी सख्त रहता किंतु व्यक्तिगत वो काफी सहज थे , अपने कार्यों के प्रति काफी सजग और जानकार  थे,  मेजर साहब ने परेड बगल शस्त्र में कराकर रिपोर्ट दी..........

आखिरकार कुछ देर बाद  हमें वो आदेश मिल ही गया जिससे लगभग सभी रिक्रूट भय में रहते थे ........परेड निकट लाइन चल...तीन और तीन में दाहिने.......................


शुरुआत में 4- 5 राउंड बहुत लगते थे किंतु अब हम सब आसानी से दौड़ जाते ........... सातवें राउंड के बाद हमें तेज चाल में कर दिया गया ...फिर टोलीवार चल दो ....पूरा शर्ट पसीने से भीग जाता तथा चेहरा शिथिल और गीला रहता हम सब अपनी अपनी टोलियों में मिलकर ग्राउंड के अलग अलग हिस्से में स्क्वाड ड्रिल करने लगते ...एक दो एक....पीछे मुड़.....जैसी आवाजों से पूरा ग्राउंड हरकत में आ जाता ।

हमारा परेड ग्राउंड अशोक, आंवला और नीम के पेड़ों से चारों तरफ से घिरा था हमारी बटालियन उत्तर प्रदेश की सबसे हरी- भरी बटालियन मानी जाती है, दूर दूर तक हरे भरे पेड़ ही नजर आते चारों तरफ ...इसलिए हवा की शुद्धता में कोई कमी नहीं थी गर्मियों में भी आप सुबह चार बजे बाहर टहलते तो आपको ठंड महसूस होती खैर हम सब 30 - 30 की टुकड़ियों में बटे अपने- अपने उस्तादों के आदेशों पर बह रहे थे।


धीरे धीरे सूर्य भी पश्चिम की दिशा में आज के दिवस को अलविदा कह रहा था, उसकी लाल किरणे मैदान की लाल मिट्टी पर पड़कर हम सबके पसीने से भीगे चेहरे में निखार ला रहीं थीं , ग्राउंड से देखने पे लगता सूरज आंवले के बाग में डूब रहा है।


हम सब भी थके हुए उस आखिरी विसेल बजने का इंतजार कर रहे थे जो हमें बैरक की ओर ले जाती ...आसमान में भी पक्षी दक्षिण-पूर्व की तरफ लौट रहे थे जो सुबह उत्तर की तरफ से आते दिखते , हम सब इंसान थे हमें सरकार ने करोड़ों  रुपए खत्म किए "समय से काम करने और अनुशासन में रहना " सिखाने के लिए और वो मासूम पक्षी अपने ठीक समय से जाते और आते और ज्यादातर वो अलग अलग समूह में एक साथ एक लाइन में ही उड़ते.....कितना अजीब था।


खैर विसेल बजी हम सब बैरक आ गए ....रात्रि गड़ना के बाद हमें  पता चला क्लास में फोन ले जाने की एक- दो शिकायतों की वजह से सभी के फोन जमा हो जाएंगे ...ऐसा सुनते ही कुछ लोगों के चेहरों के रंग उड़ गए ,  कोई कुछ भी बोले जा रहा था लेकिन अब कोई कितना भी बेचैन हो गलतियां कुछ ही करते किंतु सजा हमे सामूहिक दी जाती या फिर हम उसका नाम लें जिसने वो गलती की ,लेकिन एकदूसरे का नाम बहुत कम ही लोग ले पाते थे अब ये चाहे मित्रता का भाव हो या एक हास्यास्पद एकता ... खैर वैसा ही हुआ हम सभी के फोन जमा हो गए .......एक सघन उदासी लिए हम सब गणना ग्राउंड से वापस लौटे , कुछ के चेहरे ऐसे हो गए जैसे उनकी  पूरी विरासत छिन गई हो ...अंदर से हम सब उस डिवाइस से इतना जुड़ गए हैं कि उसमें ही हमें अपनी पूरी दुनिया लगती...खैर उस रात बैरक का माहौल देखने वाला था ,

सभी अपने अपने बेड पर बैठकर एक दूसरे को ताक रहे थे ,कोई अपनी चीजें इधर उधर सेट कर रहा था कोई अलमारी में कुछ ढूंढ रहा था , मैने भी काफी समय बाद एक  बुक निकाली जो JTC से बैग में पड़ी थी , निकालकर पढ़ने लगा 

कुछ देर बाद मैने देखा कि जो लोग आते ही स्क्रीन में जुट जाते थे आज वो आपस  में बात कर रहें हैं कोई अपने अनुभव शेयर कर रहा तो कोई अपनी आपबीती सुना रहा, पास में चार - पांच लोगों का एक समूह लूडो खेल रहा था , आज ये पहली बार था कि रिक्रूट एक दूसरे के साथ मिलकर बैरक में कोई गेम खेल रहें हों  ।

किताब पढ़ते पढ़ते मैने ध्यान दिया मेरे साइड वाले बेड पर लेटा एक लड़का लगातार करवटें बदल रहा है पता नहीं किस परेशानी में है यह वही था जिसे रोज फोन पर बात करते करते 12 बज जाते ....आज फोन ना होने की वजह से बेचारा परेशान ..जगने का कोई कारण नहीं किंतु नींद आंखों से कोसों दूर ...आखिर विवश होकर वह भी स्कूल बैग से कोई बुक निकालकर पढ़ने लगा ...कितना कुछ बदल जाता हैं सिर्फ एक चीज के पास न होने से ।


सुबह नींद खुलते ही मैं कुछ ढूंढने लगा बाद में याद आया कि फोन ऑफिस में जमा है , रात में तो उतनी नहीं किंतु अब मुझे भी दिक्कत महसूस हुई , उठने से लेकर , दिन का रूटीन देखने , समय देखने सभी चीजें फोन पर ही निर्भर थीं ।

आज सुबह की परेड में लगभग सभी समय पर ही थे दोपहर की क्लास के बाद फोन मिल जाएंगे ऐसा सुनने में आने लगा , आखिरकार कड़ी चेतावनी के बाद सभी के फोन वापस कर दिए गए,  फोन वापस होते ही एक निस्सीम खुशी के साथ ही सभी की नजरें और हाथ के अंगूठे हरकत में आ गए , चेहरे खिल उठे और ऐसा लगा जैसे किसी बड़ी नदी का बांध खोल दिया गया हो और वो अनवरत बहने लगी ।।।।।।

              *Sunny sharma*

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